kaleva means "breakfast" in Haryna. Haryana people are found of milk,butter,ghee and buttermilk.
Wednesday, August 5, 2026
"रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम..."
जगजीत सिंह जी की मखमली आवाज़ में गाई गई यह मशहूर ग़ज़ल हम सबने सुनी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इश्क और मोहब्बत से शुरू होने वाली यही ग़ज़ल आगे चलकर 'इंकलाब' और देशभक्ति का एक बुलंद नगमा बन जाती है?
इस अमर ग़ज़ल के रचयिता थे मौलाना हसरत मोहानी—वही महान स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी उर्दू शायर, जिन्होंने 1921 में पहली बार देश को "इंकलाब जिंदाबाद!" का ऐतिहासिक नारा दिया था। बाद में शहीद-ए-आज़म भगत सिंह और उनके साथियों ने इस नारे को हर भारतीय के दिल में बसा दिया।
हाल ही में जब जंतर-मंतर पर युवाओं ने पेपर-लीक और अव्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाई, तो उन्हें 'कीड़े-मकोड़े' कहा गया। इसके जवाब में युवाओं ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' बनाकर सड़कों पर "इंकलाब जिंदाबाद!" के नारे गूँजा दिए।
हसरत मोहानी जी की इस ग़ज़ल का आखिरी शेर आज के इस युवा आक्रोश और सत्ता के रवैये पर बिल्कुल सटीक बैठता है:
"अच्छा है अहल-ए-जौर (अत्याचारी) किए जाएँ सख़्तियाँ, फैलेगी यूँ ही शोरिश-ए-हुब्ब-ए-वतन (देशभक्ति की लहर) तमाम।"
यह शेर हमें याद दिलाता है कि दमन से कभी आंदोलन खत्म नहीं होते। सरकारें चाहे जितना दबाव बनाएँ, अत्याचार केवल देशभक्ति की भावना और अन्याय के खिलाफ जन-आक्रोश को और बढ़ाता है।
जब-जब सत्ता में अहंकार दिखता है, देश का युवा शांतिपूर्ण और काव्यात्मक तरीके से 'इंकलाब' का परचम लहरा ही देता है।
जगजीत सिंह जी की आवाज़ में यह ग़ज़ल यहाँ सुनें
XO
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